Friday, December 13, 2019

वसीयत और नसीहत"

     
 

एक दौलतमंद इंसान ने अपने बेटे को वसीयत देते हुए कहा,

बेटा मेरे मरने के बाद मेरे पैरों में ये फटे हुऐ मोज़े (जुराबें) पहना देना, मेरी यह इक्छा जरूर पूरी करना ।*

पिता के मरते ही नहलाने के बाद, बेटे ने पंडितजी से पिता की आखरी इक्छा बताई ।

पंडितजी ने कहा: हमारे धर्म में कुछ भी पहनाने की इज़ाज़त नही है।

पर बेटे की ज़िद थी कि पिता की आखरी इक्छ पूरी हो ।

बहस इतनी बढ़ गई की शहर के पंडितों को जमा किया गया, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला ।

इसी माहौल में एक व्यक्ति आया, और आकर बेटे के हाथ में पिता का लिखा हुआ खत दिया, जिस में पिता की नसीहत लिखी थी

_"मेरे प्यारे बेटे"

देख रहे हो..? दौलत, बंगला, गाड़ी और बड़ी-बड़ी फैक्ट्री और फॉर्म हाउस के बाद भी, मैं एक फटा हुआ मोजा तक नहीं ले जा सकता ।

*एक रोज़ तुम्हें भी मृत्यु आएगी, आगाह हो जाओ, तुम्हें भी एक सफ़ेद कपडे में ही जाना पड़ेगा ।*

लिहाज़ा कोशिश करना,पैसों के लिए किसी को दुःख मत देना, ग़लत तरीक़े से पैसा ना कमाना, धन को धर्म के कार्य में ही लगाना ।

सबको यह जानने का हक है कि शरीर छूटने के बाद सिर्फ कर्म ही साथ जाएंगे"। लेकिन फिर भी आदमी तब तक धन के पीछे भागता रहता है जब तक उसका निधन नहीं हो जाता।
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संसार को मत बदलो




एक बार की बात है एक राजा था जो कि एक समृद्ध राज्य का संचालन करता था। एक दिन वह अपने राज्य के दूर दराज इलाकों का दौरा करने के लिए गया।
जब वह अपने महल में वापस लौटा, उसे अपने पैरों में बहुत दर्द महसूस हुआ क्यों कि इतनी लम्बी यात्रा पर वह पहली बार गया था और उसकी यात्रा का मार्ग काफ़ी उबड़-खाबड़ था। उसने आदेश पारित किया कि सम्पूर्ण राज्य के सभी मार्गों को चमड़े से पाट दिया जाये जिससे कि यदि वह भविष्य में कभी कहीं जाये तो उसके पैरों में कष्ट न हो।
किन्तु, उसके इस आदेश का पालन हो पाना इतना आसान न था। इसके लिए हजारों गायों/भैसों की खाल की आवश्यकता थी, अतः यह काम बहुत खर्चे वाला था।
यह देखकर राजा के एक समझदार मंत्री ने बड़ी हिम्मत जुटा कर उसे सुझाव दिया, " महाराज ! आपको सारे मार्गों पर चमड़ा बिछा कर इतना अधिक खर्चा करने की क्या आवश्यकता है ? आप चमड़े का एक टुकड़ा काट कर केवल अपने पैरों पर क्यों नहीं पहन लेते ? "
पहले तो राजा को उसका सुझाव अजीब सा लगा किन्तु, बाद में राजा मान गया और उसने अपने पैरों के लिए एक चमड़े का खोल या 'जूता' बनवा लिया और उस मंत्री को पुरस्कृत किया।
इस कहानी में एक महत्वपूर्ण सन्देश है और वह यह है कि इस संसार में सुख से रहने का मूलमंत्र है कि संसार को बदलने का प्रयास न करो बल्कि स्वयं को बदल डालो।

लाजवाब पंक्तियाँ



तन्हा बैठा था एक दिन मैं अपने मकान में,
चिड़िया बना रही थी घोंसला रोशनदान में।

पल भर में आती पल भर में जाती थी वो,
छोटे छोटे तिनके चोंच में भर लाती थी वो।

बना रही थी वो अपना घर एक न्यारा,
कोई तिनका था, ना ईंट उसकी कोई गारा।

कुछ दिन बाद....
मौसम बदला, हवा के झोंके आने लगे,
नन्हे से दो बच्चे घोंसले में चहचहाने लगे।

पाल रही थी चिड़िया उन्हे,
पंख निकल रहे थे दोनों के,
 पैरों पर करती थी खड़ा उन्हे।

देखता था मैं हर रोज उन्हें,
जज्बात मेरे उनसे कुछ जुड़ गए ,
पंख निकलने पर दोनों बच्चे,
 मां को छोड़ अकेला उड़ गए।

चिड़िया से पूछा मैंने..
तेरे बच्चे तुझे अकेला क्यों छोड़ गए,
तू तो थी मां उनकी,
फिर ये रिश्ता क्यों तोड़ गए?

चिड़िया बोली...
परिन्दे और इंसान के बच्चे में यही तो फर्क है,

इंसान का बच्चा.....
पैदा होते ही अपना हक जमाता है,
न मिलने पर वो मां बाप को,
कोर्ट कचहरी तक भी ले जाता है।

मैंने बच्चों को जन्म दिया,
पर करता कोई मुझे याद नहीं,
मेरे बच्चे क्यों रहेंगे साथ मेरे
क्योंकि मेरी कोई जायदाद नहीं।

मेरी कोशिश

असफल हो गया था मैं अपने पहले प्रयास में
कुछ कमी आ गई थी तब मेरे आत्मविश्वास में
मैं डर गया था कि अब मुझसे नहीं हो पाएगा
मेरी  मंजिल  मेरा  सपना  अधूरा  रह  जाएगा
लक्ष्य के पास होकर भी बहुत दूर खड़ा था मैं
हार गया युद्ध जिसको जी-जान से लड़ा था मैं

फिर से आंखें चमक पड़ी आशा की किरण छाई
मेरे गम को मिटाने फिर एक सुनहरी सुबह आई
लिया निर्णय एक बार फिर उतारूंगा मैदान में
मंजिल  पाने को अपनी लगा दूंगा अपनी जान में
एक दिन तो ऐसा आएगा मेरी मेहनत रंग लाएगी
चलते चलते ही सही मंजिल तो मिल जाएगी

कोई सपना अधूरा नहीं रहता
अगर दिल में विश्वास हो
कोई मंजिल नहीं छूटती
अगर पाने का  प्यास हो

आज से निर्णय ले लो तुमको लड़ना है जीवन में
तुमको बढ़ता है जीवन में कुछ करना है जीवन में
कांटे हो या पत्थर बिछे हो तेरी राहों में
मंजिल की प्यास लेकर चल अपनी निगाहों में

हार तेरी होगी लेकिन केवल तू नहीं हारेगा
अपने संग संग तू उन लाखों सपनों को भी मारेगा
जो तेरी राह में दिन रात आंखें बिछाए रहते है
जो कहते हैं एक दिन मेरा बेटा आईएएस बनकर आएगा

इंतजार कर रहे हैं मेरे अपने वह दिन कब आयेगा
जिस  दिन  मेरा  बेटा  आईएएस  बनकर  आयेगा
मां  की  आंखों  का  तारा  पिता  का  प्यारा  बेटा
तुझे  बनना  है  लाखों  बेसहारों  का  सहारा  बेटा

अब सोना छोड़ दे ख्वाबों के लिए
उठ कर बैठ जा किताबों के लिए
ख्वाबों को किताबों के पन्नों से जोड़
रातों की नींदें और सपनों को छोड़
अपने सपनों को कर ले तू पूरा
कोई भी मंजिल रहे ना अधूरा
सपने तो सच होंगे तुम्हारे
चमकेंगे कंधों पे तेरे सितारे
मंजिल पुकार रही है तुझको अब तो तेरी बारी है
मृत्यु से डर नहीं लगता है मौत से अपनी यारी है
अभी हार नहीं मानी है युद्ध अभी तो जारी है
जीत का जश्न मनाएंगे ऐसी अपनी तैयारी है

अस्त्र-शस्त्र हैं साथ तुम्हारे किस बात की कमी है
क्यों कदम तेरे रुके हुए हैं क्यों तेरी गति थमी है
क्या दिख नहीं रहे हैं तुझको आसमां के सितारे
क्या सुनाई नहीं दे रही तुझको मंजिल की पुकारे
दिल में मंजिल की चाहत और आंखों में नमी है
अस्त्र-शस्त्र हैं साथ तुम्हारे किस बात की कमी है

भोर हो गई है सूरज निकल रहा है
अंधेरा कट रहा है वक्त बदल रहा है
 मैं तो उस मंजिल का मुसाफिर हूं
 जो अपनी मंजिल की तलाश में
अनवरत चल रहा है

भूगोल भी है इतिहास भी है
अपनों को मुझसे आस भी है
किताबों पर मुझको विश्वास भी है
आंखों में मंजिल की प्यास भी है
अब उसको पाना है जो जीवन में लक्ष्य है
यह कुछ और नहीं मेरा अध्ययन कक्ष है..

Thursday, December 12, 2019

अनोखी मुहब्बत


एक बार जरूर पढ़े !
मां देख लो मैं कब से घर आया हुआ हूँ भूख से बुरा हाल है
अभी तक खाना गरम करके नहीं लाई आपकी लाडली

अभी लाई भाई

ये देखो शर्ट पर हल्का सा दाग़ वैसे ही है

तुम्हें तो कपड़े भी ठीक से वाश करने नहीं आते

लाओ भाई मुझे दे दो दोबारा वाश कर दुंगी

ये पहन लो कल ही मां से नई मंगवाई है आपके लिए

उफ्फ खाने में इतनी मिर्ची

पता नहीं कब खाना बनाना आएगा इस चुड़ैल को

मां आप खुद बना लिया करें ना

ऐसा खाना मुझसे नहीं खाया जाता

मां बोलीं बेटा यहां बनाना सीख जाएगी तो

ससुराल में अच्छा बनाएगी

इसलिए इससे बनवाती हूँ सब

मतलब इसकी शादी तक बर्दाश्त करना पड़ेगा

मां मुझे घूरने लगी

अब पता ही नहीं चला कब वक्त गुज़र गया

और इस चुड़ैल की शादी का दिन आ गया

सुबह से ऐसा लग रहा था कुछ छिनने वाला है आज

वही बहन जिससे बात बात पर लड़ता था

आज जान से प्यारी लग रही थी

आज सिर्फ उसकी ही फिक्र थी 

फिर विदाई के समय खुद बच्चों की तरह रोता देखा  हूँ

यूँ लग रहा है जैसे दुनिया लुट गई हो

हर वक्त बहनों से लड़ते हैं हम

मगर जब ये वक्त आता है तो लगता है

जैसे जिस्म से जान ही निकल जाती है ।

कडवी सच्चाई

🎓कडवी सच्चाई🎓

जो लड़किया कम कपड़े पहनती है, उनके लिये एक पिता की ओर से समर्पित :
एक लड़की- को उसके पिता ने iphone गिफ्ट किया..
दूसरे दिन पिता ने लड़की से पुछा, बेटी iphone मिलने के बाद सबसे पहले तुमने क्या किया?
लड़की :- मैंने स्क्रेच गार्ड और कवर का आर्डर दिया...
पिता :- तुम्हें ऐसा करने के लिये किसी ने बाध्य किया क्या?
लड़की :- नहीं किसी ने नहीं।
पिता :- तुम्हें ऐसा नही लगता कि तुमने iPhone निर्माता की बेइज्जती की हैं?
बेटी :- नहीं बल्कि निर्माता ने स्वयं कवर व स्क्रेच गार्ड लगाने के लिये सलाह दी है...
पिता :- अच्छा तब तो iphone खुद ही दिखने मे खराब दिखता होगा, तभी तुमने उसके लिये कवर मंगवाया है?
लड़की :- नहीं, बल्कि वो खराब ना हो इसीलिये कवर मंगवाया है..
पिता :- कवर लगाने से उसकी सुन्दरता में कमी आई क्या?
लड़की :- नहीं, इसके विपरीत कवर लगाने के बाद iPhone ज्यादा सुन्दर दिखता है..
पिता ने बेटी की ओर स्नेह से देखते कहा....
बेटी iPhone से भी ज्यादा कीमती और सुन्दर तुम्हारा शरीर है और इस घर की और हमारी इज्जत हो तुम,
उसके अंगों को कपड़ों से कवर करने पर उसकी सुन्दरता और निखरेगी...
बेटी के पास पिता की इस बात का कोई जवाब नहीं था सिर्फ आँखों में आँसूओं के अलावा।

सभी से नम्र निवेदन-भारतीय संस्कृति, संस्कार ओर अस्मिता को बनाए रखे..


ईर्ष्या और हमारा जीवन


एक बार एक महात्मा ने अपने शिष्यों से कहा कि वे कल प्रवचन में अपने साथ एक थैली में कुछ आलू 🥔भरकर लाएं। साथ ही निर्देश भी दिया कि उन आलुओं पर उस व्यक्ति का नाम लिखा होना चाहिए जिनसे वे ईर्ष्या करते हैं। अगले दिन किसी शिष्य ने चार आलू, किसी ने छह तो किसी ने आठ आलू लाए। प्रत्येक आलू पर उस व्यक्ति का नाम लिखा था जिससे वे नफरत करते थे।

अब महात्मा जी ने कहा कि अगले सात दिनों तक आपलोग ये आलू हमेशा अपने साथ रखें। शिष्यों को कुछ समझ में नहीं आया कि महात्मा जी क्या चाहते हैं, लेकिन सबने आदेश का पालन किया। दो-तीन दिनों के बाद ही शिष्यों को कष्ट होने लगा। जिनके पास ज्यादा आलू थे, वे बड़े कष्ट में थे। किसी तरह उन्होंने सात दिन बिताए और महात्मा के पास पहुंचे। महात्मा ने कहा, ‘अब अपनी-अपनी थैलियां निकाल कर रख दें।’ शिष्यों ने चैन की सांस ली। महात्मा जी ने विगत सात दिनों का अनुभव पूछा। शिष्यों ने अपने कष्टों का विवरण दिया। उन्होंने आलुओं की बदबू से होने वाली परेशानी के बारे में बताया। सभी ने कहा कि अब बड़ा हल्का महसूस हो रहा है।…

महात्मा ने कहा, ‘जब मात्र सात दिनों में ही आपको ये आलू बोझ लगने लगे, तब सोचिए कि आप जिन व्यक्तियों से ईर्ष्या या नफरत करते हैं, आपके मन पर उनका कितना बड़ा बोझ रहता होगा। और उसे आप जिंदगी भर ढोते रहते हैं। सोचिए, ईर्ष्या के बोझ से आपके मन और दिमाग की क्या हालत होती होगी?

 ईर्ष्या के अनावश्यक बोझ के कारण आपलोगों के मन में भी बदबू भर जाती है, ठीक उन आलुओं की तरह। इसलिए अपने मन से इन भावनाओं को निकाल दो। यदि किसी से प्यार नहीं कर सकते तो कम से कम नफरत मत करो। आपका मन स्वच्छ, निर्मल और हल्का रहेगा।🙏🏻